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मेरा , तेरा और इस परिभाषा से परे सब कुदरत का -द्वारा - श्राबोनी पुरी

क्षमता नहीं, हमारा चुनाव तय करता है की हम कौन हैं, हमारी वास्तविकता क्या है।

मुठ्ठी भर ‌प्रकृति प्रेमी जागरूक भविष्य दृष्टा आज भी सिर्फ गहरी सांस भर रहे हैं। उनके अपने समर्पण और समझौते के हिंडोले किनारे लाने के प्रयास में, वे सिर्फ मुठ्ठी भर हैं।
और रंगीन केंचुली में छिपे बैठे जीवन के फलसफो को नये नये जामा पहनाते हम, असमय, अराजक, अनुचित, निमर्म, नगन्य, मानव।

विश्व पर्यावरण दिवस हो या पृथ्वी का दाह संस्कार, जिस मतलब से बहती गंगा में हाथ धुल जाये, उस गंगा के चीथड़ों की आर्तनाद पे अटृहास करते हम। 

बहुत इतराई होगी प्रकृति जब नर में अपना सहचर ढूंढा होगा। पुरूष और प्रकृति ने मिलकर संसार सजाया होगा।
मैं मेरे में तुम तुम्हारे में, फिर भी साथ के घेरे में और जो बीच में वो धरती का, ये वेदों के मंत्र में।
विश्वव्यापी महामारी में विजय हमारी नहीं प्रकृति की है। हमेशा अपने निस्वार्थ प्रेम को लुटा कर नर के बाहुपाश से विवश अपने अंतःपुर को निस्व करती है।  हर बार अपनी हल्की आहट सुनाती है।

घने जंगलों की दावाग्नी, भुकम्प, भुसखलन, चक्रवात, सूखा, बाढ़ बस हल्की सी आहट
इन्सान है आंख का अंधा, नाम नयन सुख। प्रकृति अपने विकराल सम्पुरणता से अनभिज्ञ सिर्फ आहट भर करतीं हैं।
हर आहट पर चौकस होने के बजाय हम आर्थिक प्रणाली और संसाधनों की आपूर्ति की गणित में  खो जाते हैं।
हम लम्बे हुए जा रहे हैं। चादर छोटी ।
विवश रक्तरंजित प्रकृति हमेशा की तरह अपना आंचल गिरा  चुकी है। गतिशील नर अपनी ललचाई आंखें फिर गड़ा चुका है।
हम अपनी आगामी पीढ़ियों को मरने छोड़ चले हैं।
हमारी आने वाली पीढ़ियां अब निश्छल,मासूम सवाल नहीं पुछा करेंगी। बस दाग देंगे एक कटू प्रश्न की उनके लिए हमने छोड़ा क्या है।
अंतरिक्ष, जल, स्थल, अग्नि, वायु के आगे हम कबंध खड़े हैं फिर भी रंगीन चश्मे से जाने किसको राजसी ठाट दिखा रहें हैं।

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